रविवार, 6 अप्रैल 2014

देवीशंकर अवस्थी सामान - वक्तव्य


 

 

 

 


 विनोद तिवारी
    C-4/604, ऑलिव काउंटी

              सेक्टर-5, वसुंधरा 
      गाज़ियाबाद-201012






    आलोचना : एक सजग आलोचनात्मक कार्यवाही
   (१८  वें देवीशंकर अवस्थी सम्मान- २०१३ के अवसर पर प्रस्तुत वक्तव्य )


आज के इस समारोह के अध्यक्ष आदरणीय मैनेजर पाण्डेय जी, असद जी, प्रणय जी और संजीव कुमार  जी | सबसे पहले मैं देवीशंकर अवस्थी की स्मृति को नमन करता हूँ | आदरणीया कमलेश अवस्थी जी और उनके परिवार के सभी सदस्यों के साथ अवस्थी जी को चाहने वाले उन्हें मान देने वाले इस सभागार में उपस्थित सभी लोगों को नमस्कार करता हूँ |

“व्यापक अर्थों में आलोचना मनुष्य की आत्मचेतना है | साहित्य और कला के रूप में निर्माण की हुयी अपनी अर्थवान रचना के सुन्दर-असुंदर, शुभ-अशुभ, सत्य-असत्य पक्षों के प्रति जागृत चेतना है |... एक बार जब आलोचना का जन्म हो जाता है, तो वह साहित्य-कला की केवल तटस्थ व्याख्याता या निरपेक्ष द्रष्टा ही नहीं बनी रहती | सांस्कृतिक परम्परा और मनुष्य के अर्जित ज्ञान का समाहार करके वर्तमान की ऐतिहासिक चेतना लेकर संवेदनशील, युगद्रष्टा आलोचक प्राचीन और सामयिक साहित्य की कृतियों का मूल्य आंकते हुए नए व्याख्या सूत्रों की उद्भावना भी करता है... इस प्रकार आलोचना स्वयं एक रचनात्मक क्रिया है |”[1]

शिवदान सिंह चौहान के इस उद्धरण के सहारे बात शुरू करने के पीछे का लक्ष्य, आलोचना के व्यापक और वृहत्तर सरोकारों की बात को उठाना है | मैं आलोचना को एक ऐसा दायित्वपूर्ण सजग आलोचनात्मक कार्यवाही मानता हूँ जो साहित्य के परिप्रेक्ष्य से उन सामजिक-सांकृतिक स्थितियों-परिस्थितियों और उनको निर्मित करने वाली  ‘संरचनाओं’ को विवेचित करे जिनमें हमारे समय-समाज के उन प्रश्नों और दबावों से उपजने वाली संघर्ष और तनावपूर्ण निर्मितियों के ‘ट्रेंड्स’ मिलते हों | इसी अर्थ में आलोचना मेरे लिए एक चुना हुआ बौद्धिक-अकादमिक दायित्व है जिसे देवीशंकर अवस्थी ‘बौद्धिक-व्यवसाय’[i][2] के रूप में रेखांकित करते हैं |

सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को निर्मित करने वाले समकालीन प्रभावों को जाने-परखे बिना साहित्य की प्रवृत्तियों और धाराओं का विश्लेषण आलोचक नहीं कर सकता | इसलिए आलोचक को विविध ज्ञान और अनुशासन की जानकारी रखना भी उसका सरोकार है अन्यथा तो उससे साहित्य की जातीय-संस्कृति छूटती चली जायेगी | इसी को मुक्तिबोध ‘जिंदगी के प्रतिबिम्बों के विभिन्न पैटर्न्स’ कहते हैं | “कहा जाता है कि, साहित्य जीवन का प्रतिबिम्ब है | इस खंड-तथ्य को हम यों भी कह सकते हैं कि, साहित्य में इन प्रतिबिम्बों की रचना अनेकों पैटर्न्स में होती है |...आलोचक या समीक्षक का कार्य, वस्तुतः कलाकार या लेखक से भी तन्मयतापूर्ण और सृजनशील होता है | उसे एक साथ जीवन के वास्तविक अनुभवों के समुद्र में डूबना पड़ता है और उससे उबरना भी पड़ता है, कि जिससे लहरों का पानी उसकी आँख में न घुस पड़े | अपने वर्ग, समाज या श्रेणी की जिन्दगी में अपनी जिन्दगी की सही हिस्सेदारी के बगैर, जो समीक्षक उस जिन्दगी के पैटर्न्स का मूल्यांकन करने बैठता है वह कभी भी सच्ची आलोचना नहीं कर सकता |”[3] इसलिए आलोचना का यह दायित्व है कि वह गतिशील सामजिक मूल्यों और बदलते हुए सांस्कृतिक व्यवहारों के साथ रचना को जोड़कर देखने, व्याख्यायित करने और मूल्यांकित करने की कोशिश करे | इसी सन्दर्भ में यह कहना होगा कि, आलोचना के मानदंड स्थिर नहीं हो सकते | आलोचना के क्षेत्र में कुछ भी निर्णीत नही होता | उसे निर्णीत बनाने की जिद होनी भी नहीं चाहिए | वह जो लेनिन ने कहा है न कि, ‘Nothing is final’. कुछ वैसी ही बात है | नियत मानदंड और प्रतिमान वाली आलोचना का रूप स्थिर और जड़ होगा | ऐसी आलोचना में अमूर्त मूल्यों का बिना सन्दर्भ के निर्गुण भाषा में प्रत्याख्यान और उपदेश प्रमुख हो जाता है | आलोचना इस तरह के किसी भी यथास्थितिवादी प्रवृत्ति से संघर्ष करती है :



खूब काट-छाँट और गहरी छील-छाल

रन्दों और बसूलों से मेरी देखभाल

मेरा अभिनव संशोधन अविगत क्रमागत[4] ...



जब इस माँग के साथ हम आज की आलोचना और उसके एजेंडे पर नजर गड़ाते हैं तो जिस एजेंडे पर आज की आलोचना सक्रिय है वह नाउम्मीद नहीं करती | उग्र हिन्दूवाद, धार्मिक कट्टरता, साम्प्रदायिकता, फासीवाद, बाजारवाद, उपभोक्तावाद, नव-साम्राज्यवादी पूँजी के खेल जैसे मानव-हितों की विरोधी प्रवृत्तियों के साथ दलित, स्त्री, आदिवासी समाजों की वर्गीय संरचनाओं और उनकी अस्मिताओं पर सामजिक आर्थिक नजरिये से आज की आलोचना सोच रही है और अपनी भूमिका का निर्वाह कर रही है | साहित्य को भिन्न-भिन्न अनुशासनों, उसके सामाजिक-साहित्यिक परिप्रेक्ष्य, उन परिप्रेक्ष्य को निर्मित करने वाली शक्तियों, सत्ताओं, सत्ता-संस्थानों और संरचनाओं के अस्तित्व पर भी उसकी नजर है | युवा-पीढ़ी की आलोचनात्मक-चेतना साहित्यिक और सांस्कृतिक विवेचन की दृष्टि से इधर निरंतर व्यापक और विस्तृत हुई है |  युवा आलोचना ने समय के साथ साहित्य से अपने रिश्ते को लगातार गहरा और ईमानदार बनाया है | समकालीन रचनाशीलता के प्रति वह अधिक विचारवान हुयी है | हमारी पीढ़ी की आलोचना में परम्परा-बोध को, इतिहास को समझने और बरतने का ढंग बदला है | बहुत से लोगों का मानना है कि, युवा-पीढ़ी की आलोचना में परम्परा-बोध और इतिहास–बोध नहीं है | पर, यह कैसे संभव है ? ‘आलोचना’ बिना इसके अपना कार्य कैसे कर सकती है | हाँ, यह जरूर है कि वह ‘परम्परा’, ‘इतिहास’ आदि के नाम पर संस्कृति के ‘ग्लोरिफिकेशन’ से वाकिफ है | अगर, इस तर्क से देखा जाय तो परम्परा और इतिहास-बोध में दरार जरूर पैदा हुयी है | “पुराने कुफ्र और आज के ईमान में अब कोई रिश्ता बाकी नहीं रह गया है |”[5]

 आलोचना का एक महत्वपूर्ण सरोकार ‘समकालीन-रचनाशीलता’ से उसके संवादी रिश्ते को लेकर है | रचना और आलोचना के पारस्परिक रिश्ते को लेकर खूब लिखा-पढ़ा गया है |  इनके बीच का रिश्ता अधिकतर विसंवादी ही रहा है | रचनाकार का यह आरोप कि, आलोचक ने उसकी रचना को समझा ही नहीं है, उसने अपने मन और विचार से असंगत निष्कर्षों को मेरी रचना पर थोप दिया है | दरअसल, मैं इसे आलोचना की कोई समस्या ही नहीं मानता | यह समस्या तब पैदा होती है जब हम आलोचना को केवल व्याख्यात्मक आलोचना के सिमित लक्ष्य में घटा कर देखते हैं | आलोचना केवल व्याख्या भर नहीं है न ही वह केवल टीका है | पहले भी यह माना जाता रहा है और आज भी जो लेखक मानते हैं कि, आलोचना का कार्य केवल रचना की प्रक्रिया, अर्थवत्ता, सार्थकता और वर्ण्य-विषय की व्याख्या तक सिमित है वह आलोचना के दायित्व और सरोकार को कमतर करते हैं | दरअसल, यह माँग ‘रचना की स्वायत्तता’ की तरह ‘आलोचना की  स्वायत्तता’ की मांग है | इसके पीछे ‘व्याख्यावादी’ भाष्यकार आलोचकों का यह तर्क है कि, “आलोचना का कृति केन्द्रित व्याख्यात्मक रूप ही वस्तुनिष्ठ हो सकता है या कम से कम वहां आलोचना की स्वायत्तता की सम्भावना अधिक है |”[6] सवाल यह है कि, क्या ‘व्याख्या’ केवल अर्थापन भर है, अर्थ की निष्पत्ति मात्र है या उस व्याख्या का कोई देश-काल भी होगा, कोई ‘कुल-शील’ भी होगा ? अगर, ऐसा है तो आलोचना किसी न किसी दृष्टि-सापेक्षता में ही सम्पन्न होगी और उसे होना भी चाहिए | इसीलिए, किसी भी तरह की ‘स्वायत्तता’ निरपेक्ष नहीं होती | अब प्रश्न यह है कि, मनचाही ‘स्वायत्तताओं’ की सापेक्षिकता ही आलोचना का दायित्व है तब तो स्थिति चिंतनीय हो जायेगी |  आलोचक को राजशेखर ने बहुत पहले ही ‘आरोचकी’ और  ‘तत्वाभिनिवेशी भावक’[7]की भूमिका में रखा है | किसी रचना की व्याख्या करना आलोचना का प्राथमिक किन्तु सीमित लक्ष्य है | उस रचना में अन्तर्निहित लक्ष्य को लक्षित कर उसे सांस्कृतिक-विवेक के साथ मूल्यांकित करना आलोचना का अंतिम और व्यापक उद्देश्य है और एक अनिवार्य सरोकार भी | आलोचना तो एक ‘इंटिग्रल टास्क’[8] है | इसीलिए उसका सरोकार इकहरा या आसान नहीं है वरन अधिक चुनौतीपूर्ण और दायित्व वाला है |  आलोचक ‘रचना की सांसारिकता’[9] का एक ऐसा चौकन्ना नागरिक है जिसकी नजर उसके हर पहलू पर टिकी रहती है | किसी कृति की व्याख्या में हम केवल यही नहीं करते हैं कि उसमें क्या कहा गया है | समर्थ आलोचक वह होता है जो उस ‘कृति’ के उन ‘आशयों’ को ‘इन्टेंशन्स’ को पकड़ने की कोशिश करता है जो उस रचना में भी पूरी तरह रूपायित नहीं हो पाते हैं | इसीलिए आलोचना अपनी शर्तों पर भी ‘रचना’ को देखती है और रचनाकार की शर्तों की भी रक्षा करती है | इन दोनों तर्कों के बीच ही समर्थ आलोचना जन्म लेती है | एक आलोचक समकालीन रचना में अपने समय के चिन्ह (imprints) ढूँढने का कार्य करता है | वह उन इम्प्रिंट्स के सहारे रचना के बीच से गुजरते हुए अगर एक ‘समझदारी भरा तनाव’ अपनी आलोचना में रचता है तो यह उस आलोचना का सृजनात्मक पक्ष है | यह समझदारी भरा तनाव ही ‘समकालीनता’ की आलोचक की समझ व परख और ‘समकालीनता’ से विचलन के संघर्ष को उजागर करता है |

आज जब मध्यवर्ग का अधिकांश हिस्सा ऐसे ‘कास्मोपोलिटन’ समय में रह रहा है जिसमें उसकी कोई एक ‘आईडेंटिटी’ नहीं है वह ‘मल्टिपल आईडेंटिटीज’ में रहने को ही ‘स्मार्टनेस’ मानता है ऐसे में पहचान की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं | ऐसे वर्ग को ‘रूटलेस फ्लोटिंग मॉस, कहा गया है जो अपने स्वार्थ और लाभ का ही एजेंडा समाज पर थोपना चाहता है | साहित्य में भी यह ‘रूटलेस फ्लोटिंग मॉस, अपनी ‘स्मार्टनेस’ के साथ सक्रिय है | आलोचना का काम है कि, वह उस ‘स्मार्टनेस’ को,  ‘मल्टिपल आईडेंटिटीज’ को पहचाने और जोखिम लेते हुए उन चालाक हितों को बेनकाब करे जो साहित्य, समाज, राजनीति, धर्म, संस्थाओं, सत्ता प्रतिष्ठानों हर कहीं अपने लोभ-लाभ का छद्म एजेंडा लिए नमूदार रहता है | शायद यही वह सरोकार होगा आज आलोचना का जो नए सन्दर्भों में पूछ सके कि ‘पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है |’

इसी बिंदु पर यहाँ यह सोचने-विचारने के लिए यह एक जरूरी प्रस्ताव हो सकता है कि, प्रगतिशील विचार और इरादों से लिखी हर रचना अनिवार्यतः उत्कृष्ट और महान नहीं होती | जबकि हर उत्कृष्ट रचना प्रगतिशील धारणा, व्यवहार और क्रियान्वयन में सहयोगी जरूर होती है | पूरे विश्व-साहित्य में इसके अनेकों उदहारण हैं | मैं यहाँ उन तफसीलों में नहीं जाना चाहता उसके लिए अवकाश यहाँ नहीं है | पर इस पर बलाघात जरूर है कि, आलोचना इतिहास निर्माण के लिए सहयोगी भूमिका का निर्वाह करती है इसलिए उसका सरोकार है कि वह ‘इतिहासाभास’ के भ्रम को विछिन्न करे | आलोचना को अपने सहगामी और प्रतिगामी दोनों ही तरह की  प्रछ्न्न्ताओं से संघर्ष करना जरूरी होता है | वह जितना दूसरों की आलोचना है उससे अधिक वह खुद के प्रति एक सजग आलोचनात्मक कार्यवाही है | यह संघर्ष ही दरअसल एक आलोचक का संघर्ष होता है |

आलोचनात्मक-चेतना को हताश करने वाले, उसे हँसी में उड़ा देने वाले, अनियंत्रित प्रचार-माध्यमों से उस चेतना को खंडित-विखंडित करने वाले भ्रमों को काटते हुए आलोचना का उत्तरदायी होना मेरी समझ में आज सबसे बड़ा सरोकार बन जाता है | अच्छी रचना को आगे ले आना, उसको मान्यता दिलाना और ख़राब रचनाओं को खराब कहने का साहस और संकल्प आलोचनात्मक-चेतना की ईमानदारी का प्रमाण बनता है | अपने रचनात्मक-समय का एक अनुशासनात्मक-परिप्रेक्ष्य तैयार करने में सहयोग करना आलोचना का सरोकार है | ‘ब्लिंकर्स’ हर समय समय और हर युग में रहते हैं | उनकी पहचान भी उन युगों में की गयी है | पर हम जिस समय में रह रहे हैं उसमें कहीं ऐसा तो नहीं कि ये ‘ब्लिंकर्स’ एक साथ मिलकर ‘सम्मिलित चकाचौंध’ पैदा कर रौशनी का भ्रम पैदा कर रहे हों | ऐसे ‘ब्लिंकर्स’ की पहचान करना और उनके द्वारा फैलाए जा रहे ‘रौशन अँधेरे’ को साफ़ करना आलोचक का ही काम है | मूल्य-मूढ़ता और वैचारिक-धुंध के प्रति आलोचनात्मक होना आलोचना का सजग दायित्व है | दरअसल, मूल्य-मूढ़ता जहाँ परम्परा–संस्कृति आदि को ‘ग्लोरिफाई’ करने में ही अपना दायित्व समझती है वहीँ वैचारिक-धुंध ‘समकालीनता’ के तकाजे से कई महत्वपूर्ण प्रश्नों और जवाबदेहियों के मनमाने इस्तेमाल की सुविधा का माध्यम बन जाता है |    

रचनाकार और आलोचक के संबंधों को आज उसी ढंग से नहीं समझा जा सकता जिस तरह पूंजीवादी समय में | आज के बदले आर्थिक-राजनितिक प्रभावों के बीच इन दोनों के रिश्तों की समझ विकसित की जानी चाहिए | उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के विरूद्ध फूहड़ रुचियों और लालसाओं को बनाने में सक्रिय बाजारवाद के खिलाफ जनधर्मी और जीवनधर्मी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिरोधों को रचना, उत्तरदायी सृजन को आगे करना, उसकी तरफदारी करना केवल आलोचक का ही दायित्व नहीं है वरन दोनों का साझा सरोकार है | आलोचक से अधिक की अपेक्षा की जाती है इसलिए उसकी जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है | आज की समकालीन रचनाशीलता को केवल ‘साहित्यिकता’ के ‘पाठों’ और ‘प्रतिमानों’ से  ही नहीं समझा जा सकता |

आलोचना का एक व्यापक और वृहत्तर सरोकार और दायित्त्व आज के बढ़ते सामजिक-सांस्कृतिक खतरों को पहचान कर उन पर सही सार्थक बहस का माहौल पैदा करना और उसे रचना है | “आलोचना साहित्यिक पाठ-मात्र को परिष्कृत और सूक्ष्म विधियों से अधिक उपभोग्य बनाने का उद्यम भर नहीं है, न ही पाठ का तुरत-फुरत में अर्थ-दोहन कर उसकी राजनितिक भूमिका तय करने, उस पर मूल्य-निर्णय सुनाने की गतिविधि है | आलोचना साहित्यिक पाठ को पढ़ने  की किसी एक पद्धति का नाम नहीं वह सांस्कृतिक-राजनीति की बृहत्तर कठिनतर कार्यवाही है | इस कार्यवाही में वह विभिन्न पद्धतियों का विवेकपूर्ण उपयोग कर सकती है है स्वयं को समृद्ध करने के लिए उसे करना भी चाहिए | “आज साहित्य, समाज, संस्कृति इस तरह एक दूसरे से गुंथे और संश्लिष्ट रूप से बहते चले जा रहे हैं कि एक साहित्यिक कृति की आलोचना लगभग समूची संस्कृति और समूची सामाजिक व्यवस्था की चुनौती बन जाती है |... क्योंकि सत्ता केवल कुछ राजनैतिक विचारधाराओं  के रूप में ही अपने को व्यक्त नहीं कर रही है बल्कि अनेक सांस्कृतिक मूल्यों, जीवन मूल्यों द्वारा साहित्य को और आलोचना कर्म को प्रभावित कर रही है |”[10] ‘स्टेट आपरेटस’ आज जिस तरह धर्म, राजनीति आदि को अविश्वसनीय, विवादी, संदेहास्पद और व्यक्तिकेंद्री बनाते चले जा रहे हैं वहाँ आलोचना के सरोकार और चुनौती-पूर्ण हो जाते हैं | ‘राज्यशक्ति’ का आज साहित्य और संस्कृति से क्या सम्बन्ध रह गया है ? क्या ‘राज्यशक्ति’ आलोचनात्मक ‘स्पेस’ को लगातार ख़त्म करती जा रही है ? “यह सही है कि, आलोचना के प्रतिरोध का स्वर अंततः ‘साहित्यिक’ होगा पर उसका लक्ष्य सभ्यता को हर तरह की बर्बरता और दमन से बचाए रखने का है |[11]  

मुझे लगता है कि, समय अधिक हो गया है | वैसे भी एक कवि के शब्दों में कहें तो आलोचना के पक्ष में अधिक बोलना अपने को संदिग्ध बना देना है | ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ के निर्णायकों का मैं शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझे इस काबिल पाया और आज आपके बीच बोलने का अवसर दिया | मैं अपनी आलोचनात्मक जिम्मेदारी को बिना किसी कोताही के और सजगता से निबाह सकूं यही इस सम्मान का महत्व होगा | अल्लामा इकबाल के इस शे’र से आपनी बात खत्म करता हूँ :     

ऐ तारिये लाहूती ! उस रिज्क से मौत अच्छी

जिस रिज्क से आती हो परवाज में कोताही |


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[1]शिवदान सिंह चौहान, 1965, हिन्दी गद्य साहित्य, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली : 57-58
[2]आलोचना मुख्यतः बौद्धिक व्यवसाय है और हमारे देश का बौद्धिक स्तर कैसा है, शायद यह कहने की आवश्यकता नहीं |...इस बौद्धिक तैयारी का असर आलोचना पर भी पड़ता है और रचना पर भी – पर आलोचना में वह बहुत प्रत्यक्ष होता है और रचना में तनिक भीतरी – जिसका कि उद्घाटन करना पड़ता है |” देवीशंकर अवस्थी, 1979, रचना और आलोचना, दि मैकमिलन कम्पनी  आफ इंडिया लिमिटेड , नयी दिल्ली, : 24   
[3]नेमिचंद्र जैन (सं.), 1985-पेपर बैक, मुक्तिबोध रचनावली- खंड : 5, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, : 83
[4]गजानन माधव मुक्तिबोध,2000-पेपर बैक, चाँद का मुंह टेढ़ा है, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, : 281
[5]विजय देव नारायण साही, तीसरा सप्तक, 2000 - पेपर बैक, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, : 183
[6]राममूर्ति त्रिपाठी, पूर्वग्रह,78-79 (जनवरी-अप्रैल,1987) सं.-अशोक वाजपेयी,भारत भवन शामला हिल्स, भोपाल, : 120
[7]स्वामी मित्रं च मंत्री च शिष्यश्चाचार्य एव च |
कवेर्भवति हि चित्रं किं हि तद्यन्न भावकः || - रामशंकर त्रिपाठी (हिंदी अनुवाद एवं टीका), काव्य-मीमांसा, मोतीलाल  बनारसीदास, प्रा.लिमिटेड, दिल्ली, : 52
[8] Terry Eagleton and Matthew Beaumont, 2009, The task of the Critique, Verso, London : 132
[9] ‘रचना की सांसारिकता’ यह पद एडवर्ड सईद का है | देखें – Edward W. Said, 1983,The World, The Text and the Critique, Harvard University Press, Cambridge : 81
[10] नामवर सिंह, पूर्वग्रह,78-79 (जनवरी-अप्रैल,1987) सं.-अशोक वाजपेयी,भारत भवन शामला हिल्स, भोपाल, : 42 
[11] वही : 42




शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

दर्द तो खूब है आशिकाना नहीं है

पक्षधर – 14,15 (संयुक्तांक)                                सम्पादकीय



     दर्द तो खूब है आशिकाना नहीं है
        (आलोचना की जरूरत आज किसे ?)


 






.............. यह एक बेहद तल्ख़
और हिला देने वाली टिप्पणी है 
                  मेरे समूचे समय पर
(उत्तर कबीर)
हिन्दी-आलोचना को लेकर इधर बराबर यह संदेह प्रकट किया गया है और किया जा रहा रहा है कि वह लगातार कमजोर, लचर, सतही, असम्वादी और अविश्वसनीय हुयी है | आलोचना ने अपनी साख गवांई है | उसकी विश्वसनीयता का दायरा कमतर हुआ है | हिन्दी आलोचना में यह निराशा का दौर है | क्या सचमुच स्थिति इतनी निराशा-जनक है ? एक पक्ष से यह सही लग सकता है पर यह सिक्के का एक पहलू है | नजर यहाँ भी टिकानी चाहिए कि आलोचना की जरूरत आज किसे है ? कौन आज आलोचना की परवाह करता है ? मैं शिद्दत से इस बात को महसूस कर रहा हूँ कि आज आलोचना का लोकतंत्र लगातार घटता-सिमटता जा रहा है ? क्या इसके पीछे एकमात्र कारण यही है कि अब आलोचना और आलोचकों में वह बात नहीं रही जो पहले हुआ करती थी | इसके ठीक उलट भी तो है | कभी अज्ञेय ने कहा था कि, यह सच है कि, नकलची कवियों से कहीं अधिक संख्या और अनुपात नकली आलोचकों का है – धातु उतना खोटा नहीं है जितनी कि कसौटियां ही झूठी हैं | अब तो इसकी पहचान ही गड्ड-मड्ड हुयी जा रही है कि कौन नकलची है और कितने नकली हैं | खोटा कहने की बात तो दूर अब हर धातु’ अपने को कंचन ही मानकर महान हुआ जा रहा है | अगर कसौटी पर कस कर उसे आप कांसा या पीतल कहने की हिमाकत करते हैं तो ‘खोटा’ सिक्का अपने नक्कालेपन को जिस समानता, बराबरी, लोकतंत्र आदि के खोखे में सुरक्षित किये रहता है उन सबको भूलकर मर्यादा की सारी हदें पार कर आपकी ऐसी-तैसी करके आपसे जीवन भर के सारे तकाजे तोड़ लेगा | असहिष्णुता की सारी हदें पार कर ‘युद्धं देहि’, ‘युद्धं देहि’ की मुद्रा में आ जायेगा | इस संघर्ष लिए रणभूमि सोशल मीडिया ने मुहैया करा ही दिया है | प्रच्छन्न लांछन, अस्पष्ट आरोप, अपुष्ट तथ्य और अतार्किक घामड़पन  को आज के साहित्यिक वातावरण का निर्भीक निरभ्रांत सत्य बनाने की पूरी कवायद  चल रही है | भाषा सपाट, तीखी और लट्ठमार होती जा रही है | सनसनी और चटखारापन इसका मिजाज बनता जा रहा है और ‘कनकौवा उड़ाना’ इसकी प्रवृत्ति | सोशल मीडिया ने व्यक्तिगत मतभेद और विरोध को सामाजिक मतभेद और विरोध के नाम पर रोमानवादी छल-प्रपंच का ऐसा मंच दिया है जिसकी कोई सीमा नहीं | उत्तर-पूंजीवादी समाज में मध्यवर्ग के झूठ और प्रवंचना का यह ऐसा जरिया बनता जा रहा है जिसमें हम सुनाना तो अधिक से अधिक चाहते हैं पर सुनना एकदम से पसंद नहीं करते | सुनाने की इतनी अधीर उग्रता और न सुनने की इतनी उद्धत उपेक्षा का माहौल पहले कभी नहीं रहा | तुरंत ‘निपटान’ सोशल मीडिया की रहन में है | अभी नहीं निपटाया तो सबकुछ ख़त्म हो जाएगा | पीछे छूट जाने का इतना भय | यह कहा जा रहा है और सच ही कहा जा रहा है कि, मुद्रण-संस्थाओं के समानांतर सोशल मीडिया ने एक ऐसा ‘स्पेस’ दिया है जहाँ कोई भी लेखक, चिन्तक आलोचक, कवि, कथाकार कुछ भी हो सकता है | पर यदि, नज़र गड़ाई जाय और तवज्जो दिया जाय तो दिखेगा कि, उस स्वतः सुलभ ‘स्पेस’ का अधिकांश हिस्सा पुनरुत्पादित, पुनरावृत्त, विचारहीन तलछट से आच्छादित प्रतिविम्ब मात्र है उससे अधिक कुछ नहीं | यह सच है कि वर्तमान को हम फूंक कर उड़ा नहीं सकते | वर्तमान की अपनी गति, अपनी अपरिहार्यता और अपनी तार्किकता होती है | पर यह भी सच है कि; वर्तमान की इस गति, इस अपरिहार्यता और इस तार्किकता में त्वरा के साथ शामिल जो कुछ है वह इतना समसामयिक है कि ‘अतीत’ होने पर उसकी ‘ऐतिहासिकता’ का कोई तकाजा नहीं बनता | क्योंकि, ‘ऐतिहासिक’ होने की भी अपनी अपरिहार्यता और अपनी तार्किकता होती है | अपनी समय में बुर्जुवा संस्कृति के संकट को पहचानने वाले मार्क्सवादी आलोचक और चिन्तक क्रिस्टोफ़र कॉडवेल के हवाले से कहा जाय तो, “ऐतिहासिक वही होगा जो इतिहास का का सृजनशील अभिकर्ता होगा |”  
रचना और आलोचना में बैर तो पुश्तैनी रहा है | परन्तु, इतना असम्वादी, असहिष्णु, गैर-जिम्मेदाराना माहौल कभी नहीं रहा | ‘लाग-डांट प्यार-बात’ का ‘स्पेस’ ख़त्म नहीं हुआ था | आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जब निराला को नकारा या उनकी आलोचना की तो निराला ने ‘कालेज का बचुआ’ शीर्षक कविता लिखकर उनकी खबर ली | परन्तु वही निराला हिन्दी साहित्य सम्मलेन के फैजाबाद अधिवेशन में ‘शुकुल जी’ का अपमान बर्दाश्त नहीं करते हैं | प्रसाद, पन्त सबने अपने समय की आलोचना से मुठभेड़ किया है | जवाब दिया है पर उसको विसंवादी नहीं होने दिया | परस्पर मिलने पर दुआ-सलाम, खैर-खातिर को बंद नहीं किया | यह नहीं कि, तुम होगे आलोचक-फालोचक मेरे ठेंगे से | त्रिलोचन अज्ञेय, मुक्तिबोध, किसको नहीं रही है अपने समय की आलोचना से शिकायत ? मुक्तिबोध ने तो हिन्दी की प्रगतिवादी समीक्षा पद्धति की भी सधे शब्दों में खबर ली है | विजय देव नारायण साही जहाँ ‘मार्क्सवादी आलोचना की कमुनिस्ट परिणति’ दिखाते हैं तो धर्मवीर भारती की भी आलोचना करते हैं | ‘विवेचना’ गोष्ठी में सार्वजनिक तौर पर यह उदघोष करते हैं कि ‘लोकायतन’ न पढ़ा है न पढूंगा | रामविलास शर्मा तो रचनाकारों के बीच खासे विवादी और नापसंद किये जाने वाले आलोचक रहे हैं | और केवल अपनी विचारधारा के प्रतिकूल रचनाकारों की ही नहीं वरन खुद अपनी विचारधारा के हमनवा रचनाकारों को भी उन्होंने केवल और केवल प्रशंसा ही नहीं की | नामवर सिंह ने यह कार्य किया है | अशोक वाजपेयी अगर ‘अकेलेपन का वैभव’ लिखकर अज्ञेय के काव्य में मनुष्य की हालत को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक, सामजिक, नैतिक और आध्यात्मिक शक्तियों को चिन्हित करते हैं तो ‘बूढा गिद्ध क्यों पंख फैलाए’ जैसा लेख लिखकर उनके शिथिल होने, लडखडाने और पैस्टोरल को पहचानने का साहस भी उन्हीं का है |  आज क्या सचमुच सब का सब बहुत अच्छा और महान लिखा जा रहा है ? भिन्न-भिन्न लेखक संगठनो, खेमों, गुटों के अन्दर प्रश्रीत-पोषित, घोषित-अघोषित सभी तरह के रचनाकार ‘महान’ से नीचे का साहित्य लिखते ही नहीं है| ‘प्रमोटर’ की भूमिका पहले भी लोग निभाते रहे हैं पर साथ ही इसकी पहचान भी कराते रहे हैं कि अमुक रचनाकार बहुत ही कमजोर रचनाकार है | भले ही वह अपने संगठन का ही क्यों न हो ? क्या वह नैतिक साहस बिला गया है या अब सच को सच कहने और सुनने  की जगह लगातार सिकुड़ती-सिमटती जा रही है ? पूरा माहौल ही बिगड़ चुका है | यह कैसा भेड़ियाधसान है ? यह कौन सा समय है ?  
वही आलोचनाएं-समीक्षाएं पसंद की जा रही हैं जो सुखद-सुभाषी और निरापद हैं | एक दूसरे के स्तुति-ब्याज से सारा कारोबार चल रहा है | क्रान्ति पूर्व रूस की साहित्यिक-दुनिया के एक चमकते सितारे निकोलाई अलेक्ज़ान्द्रोविच ने इस तरह की आलोचना की बहुत ही सधी शैली में लिहाड़ी ली है | निकोलाई अलेक्ज़ान्द्रोविच रूस में दास-प्रथा और जारशाही के  कटु आलोचक रहे हैं | पर दुर्भाग्य से मात्र 25 साल की अवस्था में ही वे इस दुनिया को अलविदा कह गए थे | निकोलाई ने लिखा है – तुर्गनेव के नए उपन्यास की विषय-वस्तु इस प्रकार है (यहाँ कथानक का सारांश होता है) | उपन्यास की यहाँ जो हमने बहुत ही क्षीण रूपरेखा दी है उससे पता चल जाता है कि उस उपन्यास में कितना जीवन और कितनी काव्यात्मकता है | एक-एक पन्ना जीवन और कविता की सुगंध से पगा है | जीवन के अत्यंत सूक्ष्म-रंगों, तीक्ष्ण मनोवैज्ञानिक विश्लेश्षण, जन-जीवन के अंतर की हिलोरों और आवेगों–उद्वेगों की गहरी समझ और वास्तविकता के प्रति वह अपनत्व से भरा किन्तु साहसपूर्ण रुख जो कि तुर्गनेव की प्रतिभा की निजी विशेषता है – इन सबका सही आभास उपन्यास को पढ़े बिना नहीं प्राप्त किया जा सकता | उदाहरण के लिए जरा देखिये, कितनी सूक्ष्मता से तुर्गनेव ने इन मनोवैज्ञानिक तत्वों को पेश किया है (यहाँ कथा का एक और सारांश तथा उपन्यास से एक लम्बा उद्धरण दिया जाता है ) | कितना अद्भुत है यह दृश्य जिसका अंकन अत्यंत कमनीय और मुग्धकर हुआ है ((फिर एक उद्धरण) या, फिर देखिये कितनी सौम्यता और साहस से इस चित्र को उभारा गया  है ( उपन्यास से एक और उद्धरण) | क्या यह आपके अंतरतम को नहीं छूता ? इसे पढ़कर क्या आपके ह्रदय का स्पंदन और तीव्र नहीं हो जाता ? क्या आपको ऐसा मह्स्सोस नहीं होता कि इसने आपके जीवन में एक नया सौन्दर्य डाल नयी दिया है एक नयी जान फूंक दिया है | मानव की गरिमा को, सत्यम-शिवम्-सुन्दरम की पवित्र भावना के महान, चिरंतन महत्त्व को यह सामने उजागर नहीं करता, उसे ऊँचा नहीं उठाता ? आज जो पुस्तक समीक्षाएं लिखी या लिखवाई जाती हैं उनका क्या हश्र हो गया है ? किसी प्रकाशन समूह की प्रचार-पत्रिका में एक पुस्तक को जिस ढंग से पेश किया जाता है क्या आज पुस्तक समीक्षाएं उससे भिन्न कुछ कहती हैं ? अगर भिन्न नहीं तब तो यही ठीक है कि एक-आध पेज में पुस्तक परिचय देकर उसका प्रचार कर दिया जाय जिसमें न समीक्षा हो न आलोचना न प्रशंसा हो न मीन-मेख | बस निरापद हो | लेखक को सुख दे |
इस अंक में कोई पुस्तक-समीक्षा नहीं दी जा रही है | रसूल हमजातोव ने ‘मेरा दागिस्तान’ में एक वाकये का जिक्र किया है जिसमें एक साहित्य-संस्थान में एक परीक्षार्थी से पूछा जाता है कि, यथार्थवाद और रोमानवाद में क्या अंतर है ? परीक्षार्थी उत्तर देता है कि, जब उकाब को उकाब कहते हैं तो यह यथार्थवाद है और जब मुर्गे को उकाब कहते हैं तो यह रोमानवाद होता है | क्या सचमुच मुर्गे को मुर्गा कहने का चलन अब खत्म हो गया ? क्या अब मुर्गे को उकाब कहलाना ही पसंद है ?   
साल दो हज़ार तेरह में हमारे बीच से शिवकुमार मिश्र, असगर अली इंजिनियर, मन्ना डे, रघुवंश, राजेन्द्र यादव, गोविन्द पुरुषोत्तम देशपांडे, रेशमा, परमानन्द श्रीवास्तव, के.पी. सक्सेना जैसी कई ऐसी शख्सियतें हमें अलविदा कह चलीं जिनका होना हमारे लिए एक मानी था | पक्षधर की ओर से इन सबको श्रद्धांजलि |


विनोद तिवारी 

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013




                                     पक्षधर         

                     प्रतिरोध की संस्कृति का रचनात्मक हस्तक्षेप 


To:
Smt. Omita Paul, Secretary to the President
Dr. Thomas Mathew, Additional Secretary to the President
Hon’ble President of India

We are appealing to you to protect India’s future. The Hon’ble Supreme Court has rightly ruled that convicted politicians/lawmakers should be disqualified from Parliament. The verdict seeks to remove the discrimination between an ordinary individual and an elected law maker, who enjoys protection under the Representation of the People Act 1950. This ruling should be implemented, not undermined. The hasty attempt of the Union Cabinet in approving an Ordinance to allow those who are found guilty, but not sentenced, to retain their seats, is a very disconcerting development and does not represent the will or the collective voice of the citizens of India.

This is a golden opportunity for you to stand with the People of India and ensure that you return this Ordinance unsigned.
Sincerely,
1.Vinod Tiwari












हस्ताक्षर करें, साथ आयें

दागी/आरोपी संसद सदस्यों/विधायकों संबंधी अध्यादेश को रोकने के लिए राष्ट्रपति से एक अपील
हस्ताक्षर करें, साथ आयें

https://www.facebook.com/notes/पक्षधर/an-appeal-please-sign-and-show-your-collective-voice/720072681341476

गुरुवार, 27 जून 2013

कौन था (?) मुल्ला नसीरुद्दीन





समकालीन सरोकार, मई-जून २०१३ 

कौन था (?) मुल्ला नसीरुद्दीन
                          
                         विनोद तिवारी

मुल्ला नसरुद्दीन एक शाम अपने घर से निकला | उसने सोचा कि चलो आज अपने दो-चार मित्रों के घर चला जाय और उनसे भेंट-मुलाकात की जाय | वह अभी घर से निकलकर कुछ ही कदम चला था कि दूसरे गाँव से उसका एक दोस्त जलाल आते हुए दिखा | जलाल जब पास आया तो उसने कहा कि मैं तो तुमसे ही मिलने आ रहा था तुम कहाँ जा रहे हो | नसरुद्दीन ने कहा, तुम घर चलो, मैं जरूरी काम से अपने दो-तीन मित्रों से मिलने जा रहा हूँ और थोड़ी देर में लौटकर आता हूँ | फिर मुल्ला को पता नहीं क्या सूझा कि उसने जलाल से पूछा कि, अगर तुम थके न हो तो मेरे साथ तुम भी चल सकते हो | जलाल ने कहा, मेरे कपड़े सब धूल-मिट्टी से सन गए हैं अगर तुम मुझे अपने कपड़े दे दो तो मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ | तुम्हारे बगैर यहां बैठकर मैं क्या करूंगा? इसी बहाने मैं भी तुम्हारे मित्रों से मिल लूँगा | नसरुद्दीन लौट कर घर आया और उसने अपने सबसे अच्छे कपड़े जलाल को दे दिए | जलाल तैयार हुआ फिर वे दोनों साथ निकल पड़े |
जिस पहले घर वे दोनों पहुंचे वहां नसरुद्दीन ने कहा, मैं इनसे आपका परिचय करा दूं, ये हैं मेरे दोस्त जलाल और जो कपड़े इन्होंने पहने हैं वे मेरे हैं | जलाल यह सुनकर बहुत हैरान हुआ | इस सच को कहने की कोई भी जरुरत न थी | बाहर निकलते ही जलाल ने कहा, कैसी बात करते हो नसरुद्दीन ! वहाँ अपने मित्र के सामने कपड़ों की बात उठाने की क्या जरूरत थी? अब देखो, दूसरे घर में कपड़ों की कोई बात मत उठाना | वे दूसरे घर पहुंचे | नसरुद्दीन ने कहा, इनसे परिचय करा दूं ये हैं मेरे पुराने मित्र जलाल; रही कपड़ों की बात, सो इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं | जलाल फिर हैरान हुआ | बाहर निकलकर उसने कहा, तुम्हें हो क्या गया है? इस बात को उठाने की क्या जरूरत थी कि कपड़े किसके हैं? और यह कहना भी कि इनके ही हैं, शक पैदा करता है, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, मुझे माफ करो मित्र ! दरअसल में मैं मुश्किल में पड़ गया था वह पहली बार वाली बात मेरे मन में गूंजती रह गई, उसी की प्रतिक्रिया हो गई | मैंने सोचा कि जो पहली बार में गलती हो गई थी उसको सुधार लूं | इसलिए, मैंने कहा कि कपड़े इन्हीं के हैं मेरे नहीं | जलाल ने कहा, अब ध्यान रखना कि इसकी बात ही न उठे यह बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए | वे तीसरे मित्र के घर पहुंचे | नसरुद्दीन ने कहा, ये हैं मेरे दोस्त जलाल दूर गाँव से आये हैं रही कपड़ों की बात, सो उठाना उचित नहीं है | क्यों जलाल ठीक है न, कपड़ों की बात उठाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है | कपड़े किसी के भी हों, उससे क्या लेना देना | मेरे हों या इनके हों कपड़ों की बात यहाँ उठाने का कोई मतलब ही नहीं है | बाहर निकलकर जलाल ने कहा, अब मैं तुम्हारे साथ और किसी के घर नहीं जा सकूंगा | मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या गया है | नसरुद्दीन बोला, दोस्त ! मैं अपने ही जाल में फंस गया हूं | मेरे भीतर जो मेरा मैंजम कर बैठा है यह उसी की प्रतिक्रियाएं हुई चली जा रही हैं | मैंने सोचा कि शुरू में दोनों बातें भूल से हो गयीं, कि मैंने अपना कहा और फिर तुम्हारा कहा तो मैंने तय किया कि अब मुझे कुछ भी नहीं कहना चाहिए, यही सोचकर भीतर गया था | अंदर पहुँच कर बार-बार मैं अपने को समझा रहा था कि यहाँ कपड़ों की बात करना बिलकुल ठीक नहीं है और उन दोनों की प्रतिक्रिया यह हुई कि मेरे मुंह से यह निकल गया और जब निकल गया तो समझाना जरूरी हो गया कि कपड़े किसी के भी हों, क्या लेना-देना | 
दरअसल, मुल्ला के ये मित्र जलाल ऐसे मित्र थे जो हर बात में मैं यह करता हूँ, मैं वह करता हूँ, मैंने उसे आज खूब उल्लू बनाया, आदि-आदि |’ मैं, मैं, मैं | जलाल अपने मम`’ से कभी बाहर आता ही नहीं था | साथ ही मुल्ला नसीरुद्दीन की प्रसिद्धि और यश से अंदर ही अंदर कुढता था | मुल्ला ने मौका पाते ही जलाल को यह आभास करा दिया कि मैंक्या है | हम सबके अंदर जो एक मैंबैठा है वह हमेशा दूसरे के अपमान में ही अपनी तुष्टि पाता है | भले ही वह गलत हो | हम उस गलत को ही सही बनाने और प्रमाणित करने के लिए तमाम तर्क-वितर्क करते चले जाते हैं | मुल्ला नसीरूदीन के नाम से ऐसे न जाने कितने हज़ारों-हज़ार किस्से-कहानियाँ, चुटकुले, हाज़िर-जवाब उक्तियाँ दुनिया भर के लोकाख्यानों में प्रचलित हैं | मुल्ला नसीरुद्दीन आज केवल एक संज्ञा भर नहीं है वह अब एक चरित है | मिथ में बदल चुका एक ऐसा विटी और हाजिर-जवाब, परिहास और बुद्धि-चातुर्य से लबरेज चरित जिसके नाम से दुनिया भर में  किस्से-कहानियाँ, चुटकुले, मजाक गढ़ कर सुने सुनाये जाते हैं | मुल्ला नसीरूद्दीन कोई एक नहीं है अलग-अलग देशों के अलग-अलग मुल्ला नसीरुद्दीन हैं | यह रूढ़ हो चुकी एक ऐसी संज्ञा है जिसे भिन्न-भिन्न देशों में ऐसे किस्से कहानियों और चुटकुलों के लिए प्रयोग में लाया जाता है | अरब, ईरान, हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्की, योरोप, चीन आदि देशों में मुल्ला नसीरूद्दीन थोड़े बहुत नाम के हेर-फेर से प्रचलित है | अरब, ईरान, हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान में यह मुल्ला नसीरुद्दीन है तो योरोपीय देशों और चीन में यह एफेन्दी या अफेंदम के नाम से मशहूर है | तुर्की में यह नाम नसीरुद्दीन होद्ज़ा है |
दरअसल, यह देश-काल की सीमाओं और इतिहास-भूगोल की लकीरों और प्रमाणों से पार विभिन्न संस्कृतियों की आवाजाही और घुलन-मिलन से निर्मित लोक-चित्त में गहरे पसरे वाचिक परम्पराओं का एक ऐसा सच है जिसे किसी प्रमाणकी दरकार नहीं | इसको ठीक इस तरह भी समझा जा सकता है जैसे भारत में व्यासोंकी परम्परा आज भी मौजूद है | पर व्यास तो एक ही हुए महाभारत के रचयिता | पर, क्या व्यास की तरह मुल्ला नसीरुद्दीन भी एक मिथकीय चरित्र था/है ? नहीं मुल्ला नसीरुद्दीन मिथकीय चरित नहीं था | तो फिर कौन था मुल्ला नसीरूदीन ? अलग-अलग दावेदारियाँ हैं कोई मानता है की मुल्ला हमारे हैं तो कोई कहता है मुल्ला हमारे हैं | हिन्दुस्तान में भी मुल्ला नसीरुद्दीन को लेकर यही दावेदारी है कि मुल्ला हमारे हैं | जब मैं तुर्की आया तो पता लगा कि, मुल्ला नसीरुद्दीन पैदायशी तुर्क थे | जहाँ वे पैदा हुए उस गांव का भी उल्लेख किया गया | यह भी बताया गया कि हर साल जुलाई के महीने में वहाँ पर मुल्ला नसीरुद्दीन के नाम से मेला लगता है जिसमें भिन्न-भिन्न तरह के लोक-संस्कृति और लोक-साहित्य से सम्बंधित आयोजन होते हैं | हिन्दुस्तान में मुल्ला नसीरुद्दीन के किस्से पढ़ा था | अपनी हाज़िर-ज़वाबी और तर्क-शक्ति के नाते वे किस्से बहुत पसंद आये थे | यहाँ, तुर्की में एक किताब हाथ लगी- वन्स देयर वाज ट्वाइस देयर वाज नॉट : फिफ्टी टर्किश फोकटेल ऑफ़ नसीरुद्दीन होद्जा | माइकल शेल्टन द्वारा लिखित इस पुस्तक में एक प्रामाणिक भूमिका के साथ मुल्ला नसीरुद्दीन की पचास तुर्की लोककथाओं का तुर्की से अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है | माइकल शेल्टन पिछले बारह वर्षों से अपनी पत्नी जोयान के साथ तुर्की में रह रहे हैं | वे एक फ्रीलान्सलेखक और पत्रकार हैं | तुर्की संस्कृति और उसके ऐतिहासिक महत्त्व से बेहद प्रभावित | उन्होंने छह तुर्की लड़कियों को गोद लिया है | तुर्की संस्कृति के महत्व को जानने समझने के क्रम में ही वे मुल्ला नासीरुद्दीन के करीब पहुंचे | इस पुस्तक के पढ़ने के बाद मन मचलने लगा कि मुल्ला के गाँव चला जाय | ‘शिवरीहिसारमुल्ला के गाँव का नाम है जहाँ मुल्ला नसीरूदीन तेरहवीं शताब्दी में पैदा हुए थे | यह कोय (तुर्की में गाँव को कोय खाते हैं) अंकारा और एस्कीशेहिरके बीच में पड़ता है | अंकारा से लगभग ४५ किलोमीटर दूर | यह हिस्सा मध्य अनातोलिया का पुराना हिस्सा है | तेरहवीं शताब्दी में यहाँ तामेरलेन का शासन था | यह वही तामेरलेन है जिसे हम तैमूरलंग के नाम से जानते हैं और जिसने दक्षिण-पूर्वी एशिया, मध्य एशिया, अफ्रीका, मंगोलिया, योरोप के कुछ हिस्सों पर आक्रमण किया था और अपने आतंक का कहर बरपाया था | तैमूरलंग ने दिल्ली पर १३९८ में आक्रमण कर तबाही मचाई थी | उस समय दिल्ली पर नसीरुद्दीन मुहम्मद शाह तुगलक का शासन था | संभव है कि जहाँ-जहाँ तैमूर गया हो उसके साथ-साथ मुल्ला नसीरुद्दीन भी रहा हो | क्योंकि, दुनिया के उन्हीं देशों में मुल्ला नसीरुद्दीन जिन्दा है जहाँ तैमूर के आक्रमण हुए | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिजेंडरीको निजंधरीकथाओं के रूप में व्याख्यायित करते हुए यह मन है कि, विभिन्न गण-समाजों के आपसी तालमेल तथा भिन्न-भिन्न जातियों, समूहों गणों और जनपदों के मिलने-जुलने से जो संस्कृति विकसित हुयी और जो सभ्यताएँ पनपीं उनमें देश-काल की सीमाएँ खत्म हो गयीं |
एस्कीशेहिरतुर्की के सबसे पुराने बसे शहरों में से है | ‘एस्कीका अर्थ है पुराना और शेहिरतो शहर है ही | यहाँ जो लोग दिल्ली घूमकर आये हैं वे बताते हैं कि एस्की दिल्लीऔर येनी दिल्लीदोनों देखा | ‘येनी दिल्लीका मतलब नयी दिल्ली | तो मैंने भी एस्किशेहिर जाने और मुल्ला का गाँव देखने कि योजना बना डाली और पहुँच गया शिवरीहिसार’ | अंकारा से जो मुख्य सड़क एस्कीशेहिरको जाती है उस पर ४०-४५ किलोमीटर चलने पर एक क़स्बा पड़ता है जिसका नाम शिवरीहिसारहै | इस चौराहे से दायें मुड़कर थोड़ी दूर चलने पर नसीरुद्दीन का गाँव पड़ता है | मेरे साथ मेरा एक छात्र भी था जिससे सुविधाजनक ढंग से मैं गांव में पहुँच गया | पर, तुर्की के कोय’ (गाँव) भारतीय गाँवों की तरह नहीं हैं | प्राकृतिक सुंदरता से भरे हुए आधुनिक सुख-सुविधाओं से संपन्न छोटे-छोटे गांव | घर-बाहर दोनों साफ़-सुथरे | शिवरीहिसारऔर उससे आगे  एस्कीशेहिर देखकर लगा कि, इन्हें पुराना क्यों कहा जाता है देखने में तो ये कहीं से भी पुराने नहीं लगते |  नाम के ठीक विपरीत | वैसे ही जैसे भारतेंदु ने सरयू पार की यात्रा में बस्ती के लिए लिखा है – ‘याकौ यदि बस्ती कहूँ तो काकौ कहूँ उजाड़ |’ एकदम विपरीत प्रभाव | शिवरीहिसारमें जिस घर को मुल्ला का जन्मस्थान मान जाता है वह तुर्की सरकार द्वारा लोक-संस्कृति की दृष्टि से विकसित किया गया एक महत्वपूर्ण स्मारक है |
मुल्ला नसीरुद्दीन के बारे में तरह-तरह कि किम्वदंतियां प्रचलित हैं | वह तुर्की लोक-कथाओं का अलहदा नायक है | वह फ़कीर है | वह सूफी है | वह हकीम है | वह मंत्री है | वह जज है | वह ज्योतिषी है | वह खगोलविद है | जिसकी समस्या का निदान जिस चतुराई से किया उसने मुल्ला को वही मान लिया | एक बार मुल्ला के घर के सामने से सड़क पर एक स्त्री अकेली जा रही थी | उसके पीछे एक आदमी चल रहा था | आदमी ने लपक कर स्त्री को अपनी बाहों में भरकर चूम लिया | स्त्री उसे भला-बुरा कहने लगी | शोर सुनकर मुल्ला बाहर निकल कर  आये | पूछा, क्या हुआ ? स्त्री ने कहा कि, इस आदमी ने मेरे साथ बद्तमीजी की है | इसको मैं जानती तक नहीं फिर इसकी हिम्मत कैसे हुयी मुझे चूमने की | मैं इसकी इस गुस्ताखी का बदला लेकर रहूंगी | मुझे न्याय चाहिए | मुल्ला नसीरुद्दीन ने बड़े ध्यानपूर्वक स्त्री को देखा और कहा हाँ तुम्हें मुकम्मल न्याय मिलना चाहिए, तुम ऐसा करो कि, इस आदमी का चुम्बन लेकर अपना बदला चुकाओ | स्त्री का चेहरा शर्म से लाल हो गया और वह धत् करके बांकी मुस्कान होंठों पर लिये वहाँ से चली गयी | तो, यह था मुल्ला का न्याय | अपने त्वरित बुद्धि और चतुराई से विकट से विकट परिस्थिति और संकट को हँसी-मजाक में हल कर देना मुल्ला नसीरुद्दीन की खासियत थी | मध्य-युग में तुर्की में आम जन-जीवन में गधे का खास महत्व था | सामन ढुलाई से लेकर सवारी करने तक गधा उपयोग में लाया जाता था | वह तुर्की जन-जीवन का एक उपयोगी पारिवारिक सदस्य की तरह था | मुल्ला नसीरुद्दीन भी गधा की सवारी करता था | पर उनका अंदाज विलक्षण था | वह गधे पर घूमकर उल्टा बैठता था | गधे के मुंह की ओर उसकी पीठ होती थी | सब यह देख कर हैरान होते कि यह कैसा मूर्ख है | एक बार कुछ लोगों ने मुल्ला से यह पूछा कि तुम गधे पर उल्टा क्यों बैठते हो ? मुल्ला का चट जवाब, ताकि, लोग मुझे गधे का विपरीत माने | शिवरीहिसारके मुख्य चौराहे पर गधे पर उल्टी दिशा में बैठे हुए सूफी दरवेश की साज-सज्जा में एक व्यक्ति कि विशालकाय प्रतिमा लगी है जो कि नसीरुद्दीन होद्जा की है |
लोक-संस्कृति में लोक-आख्यानों, कहावतों, चुटकुलों, मुकरियों आदि का विशेष महत्व रहा है | ऊपरी तौर पर तो अभिव्यक्ति के इन रूपों को सतही  मजाक मानकर क्षणिक मनोरंजन का साधन मात्र समझ लिया जाता है पर अपनी आंतरिक संरचना में इन वाचिक रूपों में समय-समाज की विद्रूपताओं का ऐसा उपहासात्मक-चित्र होता है जो अपनी अर्थ-छवियों में प्रतिरोधी और आलोचनात्मक होते हैं | लोक-प्रतिरोध का यह भी एक खास तरीका था | उस भयानक सेंसरशिप के ज़माने में विद्रूपताओं को व्यंग्य और उपहास के जरिये जन-जन तक पहुँचाने की एक विशेष शैली के रूप में जन-मानस इसका उपयोग करता रहा है |
इस तरह मुल्ला नसीरुद्दीन मध्यकाल का एक ऐसा ऐतिहासिक चरित्र था जो अपनी प्रसिद्धि के चलते संज्ञा न रहकर एक विशेषण बन गया और भूगोल और तवारीख की सारी हदें पार कर दुनिया भर के कई देशों में अपनी बुद्धि और चतुरायी के किस्सों के साथ लोगों के बीच आज भी जिन्दा है |

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युवा आलोचक | पक्षधर पत्रिका का संपादन-प्रकाशन | दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी का अध्यापन | आजकल अंकारा विश्वविद्यालय, अंकारा (तुर्की) में विजिटिंग प्रोफ़ेसर |
ई-मेल :  tiwarivinod4@gmail.com फोन:+903124418757 मोबा. +9005303639128