शनिवार, 27 सितंबर 2014

पक्षधर-16  
सम्पादकीय 
  जो सलीब अपनी कीलों से लिखती है
                                                                     विनोद तिवारी
            मैं अपने आभ्यंतर का आलोचक (Critical Insider) हूँ | अपनी संस्कृति को अपनी ही दृष्टि से देखना, अनुमान करना हमारे लिए महत्वपूर्ण है| हमारी परम्परा का विकास इसी कारण हुआ है | वेद की परम्परा आयी | बुद्ध ने इस पर प्रश्न किया | मैं भी उसी परम्परा का हूँ | साहित्य का हूँ, साहित्य में भी बसवण्णा, कनक दास, कुमार व्यास,नवोदय लेखक, नव्य लेखकों की परम्परा का | कालानुक्रम में यही साहित्यिक परंपरा से प्रश्न करते, ढका देते हुए उसका विकास करते हुए आये हैं |” ( यू. आर. अनंतमूर्ति की पुस्तक किस प्रकार की है यह भारतीयतासे)                                                                    
 नारणप्पा के शव-संस्कार का जब प्रश्न उठा तो उसका स्वयं समाधान करने की कोशिश मैंने नहीं की | मैं परमात्मा पर भरोसा करता रहा;धर्मशास्त्रों के पन्ने उलटता रहा | लेकिन क्या ठीक इसी उद्देश्य से हमने शास्त्रों का निर्माण नहीं किया है ? हमारे द्वारा किये गए निर्णयों के और समूचेसमाज के बीच गहरा सम्बन्ध होता है | अपनी प्रत्येक प्रक्रिया में हम अपनेपूर्वजों, अपने गुरुओं अपने देवी-देवताओं, अपने मानव संगी साथियों को लपेट लेतेहैं | अंतर का संपर्क इसी कारण पैदा होता है | जब मैं चन्द्री के साथ सोया था, तो किसी ऐसे संघर्ष का भान हुआ था ? क्या उस बारे में अपना निर्णय किसी विशेष नाप-तोल के बाद मैंने किया था ?” (‘संस्कारउपन्यास में वेदान्त शिरोमणि प्राणेशाचार्य का द्वंद्व)
सार्वजनिक जीवन रहना चाहिए | वाच्यार्थ स्पष्ट रहना चाहिए ध्वन्यार्थ भी स्पष्ट रहना चाहिए | लेकिन आज के कई राजनीतिज्ञों मेंशर्मजैसी नैतिक भावना भी नहीं है | राजनीति में हर अच्छा व्यक्ति लगना चाहिए | केवल चुनाव लड़ना ही राजनीति नहीं है | आम लोगों की समस्यायों को हिम्मत से कहना आवशयक बन चुका है |” ( यू.आर. अनंतमूर्ति की पुस्तक किस प्रकार की है यह भारतीयतासे) 

धर्म और धर्माचरण आधारित साम्प्रदायिक-राजनीतिक शक्तियों के प्रति आलोचनात्मक और अनासक्त नैतिक बोध रखने वाले, लम्पटता और कट्टरता की समूहगत राजनीति को लगातार चुनौती देने वाले, परम्परा और संस्कृति को निरंतर आलोच्य और परीक्षणीय बनाने की वकालत करने वाले, एक तेजस्वी मष्तिष्क, लोहियावादी, आधुनिकलेखक, विचारक और सार्वजनिक-बुद्धिजीवी उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति ने अंततःइस दुनिया से विदा ले लिया | सार्त्र ने लिखा है कि, लेखकों को अपने घर ज्वालामुखी के मुहाने पर बनाना चाहिए | अनंतमूर्ति जैसे लेखकों ने अपने लेखक होने के उत्तरदायित्व को सचमुच ज्वालामुखी के मुहाने पर रहते हुए निभाया | भारत में ही नहीं पूरे विश्व की साहित्यिक विरादरी से अनंतमूर्ति को जो प्रेम और सम्मान मिला वह उनके लोकप्रिय होने का प्रमाण है | अनंतमूर्ति की सोच उनके विचार उनका सृजनात्मक-रचनात्मक कार्य उन्हें एक ऐसे भारतीय लेखक और विचारक के रूप में स्थापित करता है जो रूढ़िवादी, साम्प्रदायिक, कट्टरवादी, कुएँ के दादुर-शिशुओं के लिए निरंतर समस्या पैदा करता रहेगा ।

अनंतमूर्ति के पूरे रचनात्मक व्यवहार में मनुष्यता की बेहतरी  के  लिए धर्म,राजनीति, समाज, संस्कृति को लेकर जो निरंतर एक आलोच्य-भाव है वह किसी प्रतिक्रया में नहीं है न ही वह यूरो-केन्द्रितआधुनिकता की दृष्टि का प्राच्य-भाव ही है | वह भारतीयताका इतना प्रामाणिक औरअसंदिग्ध आधुनिक पाठ है जिसे अनंतमूर्ति को उनकी उसी भारतीयपरम्परा ने उपलब्ध कराया है, जिस भारतीय परम्परा ने उनका विरोध करने वाले, उनके खिलाफ नफरत और घृणा फैलाने वाले उनकी मृत्यु का जश्न मनाने वालों को तंगनजरी दी है | ‘परम्पराको हेरिटेज मानकर उसे सिर्फ गर्व और गौरव के, महान और महानता के अविवेकी शिखर से देखने वालों के ऊपर आपको तरस भी क्योंकर आये | इसलिए जब एक व्यक्ति यह कह रहा है कि, वह अपने आभ्यंतर का आलोचक है तो उनकी समझ में ही यह नहीं आ सकता कि, दरअसल वहक्या कहना चाहता है | अनंतमूर्ति लगातार इस बात को लगातार दोहराते रहे, अपनी रचनाओं में रचते रहे कि, ‘यदि आपका परंपरा से कोई झगड़ा नहीं होगा तो वर्तमान में आपसे कोई सृजन कार्य भी नहीं होगा | और यह झगड़ा बहुत बार खुद अपने आप से भी होताहै | परम्परा से मेरा झगड़ा किसी बाहरी व्यक्ति का सा नाता नहीं रखता, बल्कि उसके भीतर बसे व्यक्ति का सा नाता है मेरा | इसलिए मैं उसमें अपने आप को  एक आलोचनाशील अन्तर्वासी की तरह पाता हूँ | कन्नड़ साहित्य की परम्परा से भी मुझे अपने इस प्रयत्न में मार्ग-दर्शन मिलता है |  हमारे आदि कवि पम्प स्वयं जैन होते हुए भी एक हिन्दू राजा के दरबार में रहे और कन्नड़ में महाभारत के रचना की | पम्प के महाभारत के वास्तविक नायक अर्जुन या कृष्णनहीं हैं वहाँ वास्तविक नायक कर्ण है जो स्वयं कई वर्ण-व्यवस्था के ऊँच-नीच काशिकार हुआ था | बारहवीं सदी के हमारे महान शिव-भक्त वचनकार संत कवि वर्ण-व्यवस्था की, वेद की अपौरुषेयता को चुनौती देते हैं | उन्हीं दिनों महाकवि बासवण्णा नेब्राह्मण कन्या का विवाह एक अछूत से कराया था । बीसवीं शताब्दी का छठा दशक नव-लेखनकी टेक पर देश भर की लगभग सभी भाषाओँ में एक नए तेवर के साथ आता है| हिन्दी में भी नयी कविता’ ‘नयी कहानी’ ‘नव-लेखनका यही दौर है | कन्नड़ में भीयह नव्य आन्दोलनके नाम से जाना जाता है | उसी नव्य-आन्दोलनकी वैचारिकी सेनिकले रचनाकार थे यू. आर. अनंतमूर्ति | कन्नड़ में इस नव्य आन्दोलन के अगुआ थे विनायक कृष्ण गोकाक और गोपाल कृष्ण अडिग | इस आन्दोलन ने अपने आलोचनात्मक तेवर और आधुनिकताके तकाजों के साथ परम्परा के पुनर्मूल्यांकन, भाषा के नए प्रयोगों,सामजिक-सांस्कृतिक असमानताओं और भेदों के चलते उस समय के सभी रचनाकारों को अपनी ओरआकर्षित किया | यू. आर. अनंतमूर्ति, पी लंकेश, शांतिनाथ देसाई, ए. के. रामानुजन,शंकर मोकाशी पुणेकर, सुमतिन्द्र नाडिग, तिरुमलेश, चंद्रशेखर कम्बार, गंगाधर चित्ताल, गिरीश कर्नाड, श्रीकृष्ण आलनहल्ली, राव बहादुर, पूर्णचंद्र तेजस्वी और निसार अहमद सभी इसनव्य-आन्दोलनका हिस्सा बने | जिस अपनी एक रचना संस्कारके चलते अनंतमूर्ति कन्नड़ के अलावा भारत और भारत से बाहर चर्चित और प्रसिद्ध हुए वह इसी नव्य आन्दोलनकी देन है |

 ‘संस्कारविश्व की किसी भी भाषा में जो कुछ महत्वपूर्ण रचा गया है उससे होड़ लेने वाला एक ऐसा आधुनिक क्लासिक है जो धर्म, धर्माचरण, वर्णव्यवस्था, जाति, समाज, परंपरा, नैतिकता, मूल्य सबमें अन्तर्निहित पाखण्ड को उजागर करता है | कृत्रिम, बनावटी, अवास्तविक आवरणों को तार-तार करता यह उपन्यास सही अर्थों में ब्राह्मणवादी-संरचनाऔर व्यवस्थाका जबरदस्त क्रिटिक रचता है | धर्मशास्त्रों की स्वयं-सिद्ध प्रामाणिक नैतिकता कोउसके सारे साक्ष्यों और प्रमाणों के साथ अपने जीवन में एक-एक पल पूरी ईमानदारी केसाथ जीने वाला प्राणेशाचार्य चन्द्री के संपर्क में आकर इस कदर अवश हो जाता है और बाद में उसी सुख की कामना के लिए चन्द्री को ढूंढता फिरता है | अनंतमूर्ति अपने हाईस्कूल के दिनों की याद करते हुए यह बताते हैं किसंस्कारउपन्यास के बीज कहाँ और कैसे पड़े | अनंतमूर्ति सनातनी ब्राह्मण परिवार से थे | अग्रहार में उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा हुयी | ऐसे ही अग्रहार के दिनों की एक घटना का जिक्र करतेहुए वे लिखते हुए वे बताते हैं कि, ‘एक बार कसबे में प्लेग फ़ैल गया और टीका लगानेवाला जो डाक्टर आया था वह गाँव के बाहर बसने वाले अछूतों की बस्तियों में गया ही नहीं | प्लेग से हरिजन मरने लगे और इधर अग्रहार के कुछ दकियानूसी अन्धविश्वासी लोग उन हरिजनों की मृत्यु के लिए उनके मंदिर प्रवेश के पाप को कारण बताने लगे |...उन्हीदिनों मैं अग्रहार में एक हस्तलिखित पत्रिका निकालने लगा था और उसमें मैंने इसीविषय पर एक कहानी लिखी | उस कहानी का सारांश यह था : हरिजन जब प्लेग से मरने लगेतब उनके कुनबे की एक अत्यंत सुन्दर युवती घर से भाग निकली | मुझे पता था कि वह क्यों भागी है | सिर्फ मैं ही यह रहस्य जनता था | अग्रहार में एक नौजवान था जोसेना में था | युवती के साथ उसके अवैध सम्बन्ध थे | इसमें मुझे लगा कि, मत्स्यगंधा जैसी दिखने वाली वह काली खूबसूरत औरत अपने बस्ती के दूसरे लोगों की तरह हाथ पर हाथ धरे मरने के लिए कत्तई तैयार नहीं थी, क्योंकि उस अछूत को छुआ जा चुका था और इस स्पर्श ने उसे जगा दिया था | बाद में हाईस्कूल के दिनों की लिखी इस कहानी को पुनः लिखने की प्रक्रिया में मेरा उपन्यास संस्कारबना |

यू. आर. अनंतमूर्ति की समूची रचनात्मक-प्रक्रिया में धर्म, जाति, लिंग, भाषा आदि के आधार पर बनायी गयी सामाजिक रूढ़ियों और असमानताओं के विरुद्ध एक विद्रोही मानवतावादी लेखक की रचनात्‍मक प्रक्रिया रहीहै | वे अपने लोकतांत्रिक-विचारों, मानवतावादी-सिद्धान्‍तों, वास्तविक व तार्किक सांस्कृतिक-म्मोल्यों पर अडिग रहने वाले एक ऐसे बेबाक और मुखर छवि वाले रचनाकार थे जिनकी आवाज में कभी भी हकलाहट नहीं सुनायी पड़ी | उनका प्रतिरोधी-स्वर अखीर तक प्रभावी और निष्कंप बना रहा | अपने लेखन और विचार में वे मार्क्स, गांधी, सार्त्र, लोहिया, जीड्डू कृष्णमूर्ति, बर्ट्रेंडर सेल, डी.एच. लारेंस   आदिसे प्रभावित रहे | वे कन्‍नड़ भाषा के उन युगान्‍तरकारीरचनाकारों में थे, जिन्‍होंने भारतीय चिन्‍तनधारा को नया उन्‍मेष दिया | अपनी रचनाओं में अनंतमूर्ति भारतीयताको उसके न्यूनतम से लेकर महत्तम तक में एक ऐसे विचारके रूप में प्रस्तावित करते हैं जिसमें उसकी पहचान को किसी ख़ास धर्म, सम्प्रदाय,परमपरा, साहित्य, भाषा, समाज, जाति, रहन, रीति, रूढ़ि, पंथ, विचार या आस्था मेंनहीं परिभाषित किया जा सकता | जब वे यह कहते हैं कि, ‘राम का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ था, बल्कि जब गोडसे ने गांधी को पिस्तौल से मारा था तब गाँधी के मुंह से जो राम निकला था वही असली राम थातो वह उस राम की बात नहीं करते जो अयोध्या केराजा दसरथ के पुत्र राम हैं वरन वह एक ऐसे राम को परिभाषित कर रहे होते हैं जिसका जन्म किसी राष्ट्रवादी-पिस्तौल से नहीं वरन पीड़ा के उन महत्तम क्षणों में होता है जिसका गान नरसी मेहता करते हैं, जिसका गान कबीर करते हैं और जिसका गान इस भारत देश की लाखों करोड़ों जनता करती है | आज जब भारतीयताको हिन्दू और हिंदुस्थानवाले कट्टर राष्ट्रवादी वैचारिकी के तंग दायरे में रिड्यूस करने के जो प्रयत्न शुरू किये जा रहे हैं उसमें अनंतमूर्ति जैसे प्रतिरोधी संबल का हमारे बीच से जाना निश्चित ही हमारे समय के अँधेरे को और घना और गहरा बनाता है |

आधुनिक लेखक होते हुए भी अनंतमूर्ति गांधी की ही तरह आधुनिकता की लगातार गहन आलोचना करने से पीछे नहीं हटते | वह पूंजीवाद के नए माडल और  विकास के रूप में भूमंडलीकरण को देखते और पहचानते हैं | भूमंडलीकरण का जो सबकुछ को लील जाने और डकार जाने का डरावना रूप है अनंतमूर्ति के यहाँ उसका बहुत ही गहरे प्रतिरोध के साथ नकार है | भूमंडलीकरण के बरक्स वे स्थानीयताकोआंचलिकताको उसके बहुसांस्कृतिक वैविध्य के साथ जीवित और बचाएरखने की बात करते हैं | उनका दृढ़ मत है कि, आज इस भूमंडलीकरण अथवा बाजारवाद के विरुद्ध कोई सही प्रतिरोधी ताकत निकलकर आयेगी वह स्थानीयताके भूगोल और संस्कृति से ही निकल कर आयेगी | भूमंडलीकरण के नाम पर जो एक तरह का स्वाद, एक तरह की रुचि, एकतरह की रहन, एक तरह की संस्कृति और एक तरह का मिजाज बनाने और रचने की कोशिश लगातार चल रही है अनंतमूर्ति उसकी निरंतर आलोचना करते रहे हैं | वे मानते हैं कि, ‘मेरे लिए यह कन्नड़ ही है जिसने मुझे लोक-स्मृतियों को, प्रतिरोध की संस्कृतियों कोजीवित रखा है | और खुद हमारे समय में हमें पश्चिम के आप्लावाक प्रभाव से उबरने और उसे पचाने का उपाय भी सिखाया है |’ अनंतमूर्ति की एक कहानी है सूरज का घोड़ा(सूर्यन कुदुरे) | इस कहानी में पूंजीवादियों की सांस्कृतिक-राजनीति और चालबाजियों का, पलायनवादी-बुद्धिजीवियों का और नव-बौद्धिक बेवकूफियों का व्यंग्यात्मक क्रिटिक रचा गया है वह अनंतमूर्ति कीसमझ को स्थापित करती है | अंग्रेज़ी के अध्यापक होने और विश्व-साहित्य और विचार को अंगरेजी के माध्यम से आत्मसात करने वाले, भारत में ही नहीं दुनिया भर में एक साहित्यिक और विचारक के रूप में पहचाने जाने वाले अनंतमूर्ति ने हमेशा अपनी भाषा कन्नड़ में ही सृजनात्मक लेखन करना जरूरी समझा | वे मानते थे कि, ‘उपनिवेशीकरण की राजनीति से उपजी मानसिकता और रु चि से हमारी वैविध्यपूर्ण बहुसांस्कृतिक पहचान की रक्षा अपनी भाषा के सृजन में ही संभव है | प्रतिरोध की प्रामाणिक अभिव्यक्ति जितने पुरजोर ढंग से हम अपनी भाषा और संस्कृति में कर सकते हैं उतनी किसी उपनिवेशित भाषामें नहीं |’ वैश्विक साहित्यिक-राजनीति वाली विरादरी में वे निरंतर भारत की सृजन-शक्ति की रक्षा का वैचारिक संघर्ष करते दीखते हैं | वी. एस. नायपाल, एरिक एरिक्सन, चिनुबा अचिबे जैसे लोगों ने अनंतमूर्ति की रचनाओं को इन्हीं मूल्यों के आधार पर महत्वपूर्ण ढंग से रेखांकित किया है |

 चिनुबा अचिबे के साथ एक उनकी एक बहुत ही दिलचस्प बातचीत है | ‘उपनिवेशवादआधुनिकता, भूमंडलीकरण, सहित स्थानीयताके साथ अपनी जातीय पहचान और अस्मिता का संघर्ष, भाषा और वर्चस्व की राजनीति आदि विषयों पर इस बातचीत में कई बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उभरकर आये हैं | बातचीत के एकक्रम में उपनिवेशनऔर आधुनिक बनानेकी प्रक्रिया के सम्बन्ध में अचिबे अपनी बात रखते हुए अनंतमूर्ति  से पूछते हैं, ‘...अपने इतिहास के आलोक में वैकल्पिक संस्कृति के निर्माण के लिए जूझने का तात्पर्य यह नहीं है कि जो कुछ पश्चिम का है जो कुछ है सबको ही आप तिलांजलि दे दें | वहां से हम बहुत कुछ ले भी सकते हैं | यह तो सत्य है कि, यूरोप चाहे जितना भी सफल रहा हो पर सभी मामलों में उसे सफलता मिली हो ऐसी बात नहीं है | इसलिए हम केवल यूरोप को ही माडल मानकर चलते हैं तो हम एक तरफ मात्र अनुकरणशील बनाते हैं और दूसरी तरफ अपने आपको पूरी तरह पश्चिमी यथार्थ-बोध से बाँध लेते हैं | आप देखें कि, लातिन अमेरिका, भारत, चीन जैसे देशों ने हज़ारों वर्षों तक जो जीवन जिया है, उस जीवन-व्यवहार में जो दंतकथाएं बनायी हैं, उन दंतकथाओं में यथार्थ और आधुनिकता का जो लोक है उनके बारे में आप की क्या राय है ?’ इस पर अनंततमूर्ति की जो राय है वह इसलिए महत्वपूर्ण है कि वे किसी भी तरह के इकहरे यथार्थ, भाव-बोध, और विचार-बोध को आधुनिकता विरोधी मानते हैं | उनकी  दृढ़ आस्था है कि, हमारी आधुनिकता इस लोकतंत्रिक-प्रक्रिया और संघर्ष से निर्धारित होगी कि, उसमें भिन्नधर्मों, भिन्न समाजों, भिन्न-भिन्न विचारों मान्यताओं और के साथ विविध जातियों औरवर्णों की समाई कितनी है | एक जाति, एक धर्म, एक संस्कृति, एक विचार ये सबतानाशाही को बढ़ावा देते हैं | इसी अर्थ में वे देश में अनेकताके पक्षधर हैं नकी किसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एकीकरण के | और अनंतमूर्ति ऐसी किसी भी तानशाही के विरुद्ध जीवन भर सन्नद्ध रहे | अनंतमूर्ति की इस प्रतिरोधी साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपरा को जीना और बचाए रखना आने वाले समय की मांग बनकर उठेगी | इसके लिए हम सभी लेखकों को यू. आर. अनंतमूर्ति के इस अपील को जेहन में रखना चाहिए-हमें सार्वजनिक विभूति बनने से बचना चाहिए अन्यथा हम केवल अपनेप्रशंसकों की आशा-आकांक्षा के गुलाम बन कर रह जायेंगे | मुझे लगता है कि, यदि हम अपनी हर नयी पुस्तक के बाद अपने कुछेक प्रशंसक नहीं खोते हैं तो जरूर ही हम लेखकोंके साथ कुछ गड़बड़ है | क्योंकि अन्यथा तो हम या तो अपना ही अनुकरण कर रहे हैं याफिर अपने प्रति हमने अपनी जो सार्वजनिक छवि बना ली है उसी को भुना रहे हैं | वक्तृता खतरनाक है, क्योंकि, यह सार्वजानिक भावावेश को, भीड़ के भावावेश को उभारतीहै | झूठ सुनते हुए लोग सुरक्षित और निश्चिन्तता का अनुभव करना चाहते हैं लेकिन उनकी आत्माएं दरअसल सच सुनने को व्याकुल रहती हैं | निपट एकांत में जिन चीजों के प्रति हमारी निष्ठा है उनके बारे में भरी सभा में कहने का साहस हमें नहीं खोनाचाहिए | अगर हम इस कदर भटक जाएँ कि, खुद से ही झूठ बोलने लगें और उस झूठ परविश्वास भी करने लगें हमें कोई नहीं बचा सकता | सार्वजनिक व्यक्तित्व या विभूति,राजनीतिक दलों के प्रवक्ता और सत्तारूढ़ वर्ग के राजकवि होने के यही सब खतरे हैं |’

 अनंतमूर्ति ताओ-ते-चिंग को बहुत पसंद करतेथे, उनके सूत्रों का अनुवाद किया है | अनंतमूर्ति को मौलाना रूमी भी बहुत पसंद थे| मेरे प्रिय लेखक और विचारक को श्रद्धांजलि के रूप में मौलाना रूमी की यह पंक्तियाँ :

 मेरेमरने के बाद धरती पर मेरी कब्र न खोजना

         मैं तोअपने आरिफ के दिलों में पाया जाउंगा |”


       X                X                X                X               X

इस अंतराल में एक-एक कर कई रचनाकार और साहित्य-संस्कृतिकर्मी विदा ले हमसे दूर चले गए | गेब्रिअल गार्सिया मार्केस,नेल्सन मंडेला, अमरकांत, विजय दान देथा, राजेन्द्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव,खुशवंत सिंह, नामदेव ढसाल, ओम प्रकाश वाल्मीकि, हरिकृष्ण देवसरे, सुचित्रा सेन, नंदा, मन्ना डे, प्राण, विनोद रैना, नवारूण भट्टाचार्य, मधुकर सिंह, तेज़ सिंह, सभी को पक्षधर की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि | एक साथ जल्दी-जल्दी  इन सबका जाना निश्चित ही एक बड़ा खालीपन छोड़ जाता है | समय क्या इन्हें भर पायेगा ?

इन दुखद विदा-गीतों में जो सबसे पीड़ादायी रहा वह रविशंकर उपाध्याय जैसे एक होनहार युवा का अचानक विदा ले लेना | रविशंकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मेरा  छात्र रहे | रविशंकर ने बहुत ही कम कविताएँ लिखी हैं | अभी तो उसने शुरू ही शुरू किया था | रविशंकर की जो सबसे ख़ास भूमिका थी वह थी नए से नए युवा लेखकों को पहचानना, उन्हें साहित्य के मंच पर एक साथ ले आना और उनके बीच साहित्य के परस्पर संवादी रिश्तों को बनाने में सेतु का काम करना | रविशंकर बिन खाए -पिए दिन रात एक कर साहित्यिक आयोजनों में रत देखा जा सकता था | रविशंकर को चाहने वाले उस पर मर मिटने वाले युवाओं की एक लम्बी फेहरिस्त है | सचमुच, रविशंकर का यूँ ही शुरू-शुरू में ही चले जाना बेहद मार्मिक और दुखद है |

पक्षधर का यह अंक गाजा में मारे गए उन अनाम बच्चों के नाम जिन्हें अब कोई नाम नहीं मिलेगा |